Saturday, August 7, 2010

dukh hai..........

हर बार की तरह इस बार भी तुमसे कुछ कह नहीं पाये,,,,,,,,,,,,,
फिर से बैठें हैं अकेले,,कहीं तेरी चाहत को दिल में दबाये  ,,,,,,,,,,,
बितायेंगे ये पूरी जिन्दगी तेरी दोस्ती की आशा के सहारे ,,,,,,,,,,
दुःख ह सिर्फ इतना की तेरे दिल में महोब्बत का आशियाँ बना नहीं पाये........................................

phir kyon,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मैं क्यों वो हर बात नहीं कह पाता जो दिल मुझसे कहता है
क्यों हर बार मंजिल पे आके ये दिल टूट जता है
हम चाहते हैं जिन्दगी के हर मोड़ पे उनका साथ
फिर क्यों वो हर रास्ता मेरे बिना तय कर जाता है

क्यों उनके संग बिताये हर प्यार के लम्हे से अपनी याद सजाता हूँ
और हर बार उसी टूटे सपने को ख्वाबों में फिर से चाहता हूँ
हम चाहते हैं जगी आँखों से देखे हर ख्वाब म उनका साथ
फिर क्यों जानते हुवे भी वो हर ख्वाब हमारे बिना देख जता है

माना की जिन्दगी भर हम उनसे अपनी चाहत का इज़हार नहीं कर पायेंगे
और उनके मासूम से चेहरे पे वो अपने लिये हंसी नहीं देख पायेंगे
हम चाहते हैं उनकी याद में बहे आँखों के हर आंसू पे उनका साथ
फिर क्यों हर आंसू पोंछने ले लिये वो हमें अकेला छोड़ जता है

ये दिल है जो हर बार लिखते हुवे उनकी ही याद में अन्दर ही अन्दर रोता है
और इस तनहा दिल की गहराइयों  में छिपी उनकी तस्वीर को खोजता है
हर सुबह बहती उस ठंडी हवा को प्रेम-पत्र हम भी देना चाहते हैं
फिर क्यों हवा का झोंका उनसे जुदाई का अहसास करवा जताहै

क्यों उनके लिये लिखा वो हर अहसास मुझे खाली खाली सा लगता है
और बिना उनके लिया अपना ही हर फैंसला झूठा झूठा सा लगता है
कोन जाने प्यार से सजी खुदा की इस महफ़िल में कोन किसके लिये बिना है
फिर क्यों लाखों की भीड़ में भी उनके पास होने का अहसास आ जाता है

क्यों हर काम को अंजाम देने से पहले कई बार उनके बारे में सोचता हुं
और अपने लिये दबे उनके दिल के अहसास को उनकी आँखों में खोजता हुं
बैठ के अकेले तो हम भी उनकी चाहत की तड़प में बहुत रोते हैं
फिर क्यों आँखों से बहा अश्कों का सागर उनके लिये नफरत को मिटा जाता है

उनसे कहने को बातें तो बहुत हैं पता नहीं किसका इंतज़ार है
दिल हर बार तोडा है उसने पर उसकी यादें भूल जाने को ना ये तैयार है
कितनी बार कोशिश कर चूका हुं उनके बारे में सोचना छोड़ दूँ
फिर क्यों वो हर बार सपनों में आके एक नई याद दे जाता है

बैठे रहें खामोश इन नजरों के सामने ऐसा ये दिल चाहता है
और उनसे दोस्ती की आशा की लहरों के बहाव में बह जाता है
लबों से उनके सिर्फ दो शब्द सुन ने की ख्वाहिश रखते हैं
फिर क्यों बेजुबाँ सामने से निकलकर वो हमें रुला जाता है

देख के उनकी आँखों में कभी हमें ऐसा भी लगता है
दिल के किसी कोने में उनके हमारी यादों का आशियाना बसता है
बेखबर होके ये दिल हर सुबह सच्ची दुवाएँ मांगता है
फिर क्यों उनकी हर दुवा से वो हमें अकेला छोड़ जाता है ......